फिर सक्रिय हुआ ‘कोयला रंगदारी नेटवर्क’, चुनाव के बाद नई हलचल
आसनसोल : पश्चिम बर्द्धमान के कोयला बेल्ट—खासकर जामुड़िया, पांडवेश्वर और रानीगंज इलाके—एक बार फिर अवैध वसूली और ‘डीओ’ आधारित रंगदारी के खेल को लेकर चर्चा में हैं। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि चुनाव खत्म होते ही इस नेटवर्क ने दोबारा तेजी पकड़ ली है और अब नए नामों के साथ पुराने खेल को आगे बढ़ाया जा रहा है।
क्या
है पूरा मामला: ‘डीओ सिस्टम’ पर रंगदारी का खेल
आसनसोल-रानीगंज कोलफील्ड में कोयला आपूर्ति का बड़ा हिस्सा “डीओ सिस्टम” से चलता है, यानी अधिकृत सप्लाई ऑर्डर के जरिए ट्रांसपोर्ट और बिक्री। लेकिन आरोप है कि इसी सिस्टम के नाम पर अवैध वसूली का समानांतर तंत्र चल रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, जामुड़िया और पांडवेश्वर क्षेत्र में कुछ स्थानीय गिरोह हर ट्रक/टन कोयले पर “कट” ले रहे हैं.
प्रति टन 1650 से 2500 रुपया तक वसूली का दावा किया जा रहा है.
बताया जाता है कि रोजाना लाखों रुपये का लेन-देन होता है. कहा जा रहा है कि वैध कारोबारी भी दबाव में भुगतान करने को मजबूर हैं. यह मॉडल नया नहीं है—बल्कि पहले से मौजूद ‘सिंडिकेट सिस्टम’ का ही अपडेटेड वर्जन माना जा रहा है। आज जो आरोप सामने आ रहे हैं, उनका पैटर्न पहले से स्थापित है—सिर्फ चेहरे और हिस्सेदारी बदलती रहती है।
कौन चला रहा है खेल? (सूत्रों के दावे)
स्थानीय स्तर पर दो नाम “मैजुल” और “विजय” तेजी से चर्चा में हैं।हालांकि इन नामों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों का कहना है: ये लोग स्थानीय नेटवर्क के जरिए ट्रांसपोर्टरों और डीओ धारकों से वसूली कर रहे हैं. अब यहां एक सवाल खड़ा हो रहा है कि किस राजनीतिक संरक्षण या ‘छत्रछाया’ के बिना इतने बड़े पैमाने पर वसूली हो रही है.
चुनाव से पहले भी गरम था मुद्दा
2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक हथियार बना था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि “कोयला सिंडिकेट” सत्ता से जुड़ा हुआ है. वहीं सत्ताधारी दल ने पलटवार करते हुए कहा कि केंद्र एजेंसियां राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई कर रही हैं. चुनावी सभाओं में “कोल माफिया” बड़ा मुद्दा बना रहा.
सबसे बड़ा सवाल
अब जब चुनाव खत्म हो चुके हैं और सत्ता परिवर्तन हो चुका है, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रंगदारी का खेल फिर से उसी स्तर पर लौट रहा है? या यह सिर्फ सत्ता बदलने के बाद नए ‘खिलाड़ियों’ की एंट्री है?
आसनसोल का कोयला सिर्फ जमीन के नीचे नहीं जलता… उसके ऊपर भी “पैसे की आग” लगातार धधकती रहती है।
सरकारें बदलती हैं… नाम बदलते हैं… लेकिन कोयला सिंडिकेट का खेल—जैसा था, वैसा ही चलता रहता है।

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